शहीद होने से पहले राखी का फर्ज निभा गया भारत का ये परमवीर जिसका नाम था वीर अब्दुल हमीद



भारत का मुस्लिम समाज काफी ही कम पढ़ा लिखा माना जाता है, इस समाज के प्रति कुछ लोगों का नजरिया काफी गलत है, क्योकि इस्लामिक कट्टरपंथियों की वजह से एक पूरे समाज को बदनाम होना पड़ता है. पर इसी मुस्लिम समाज ने चाहे आज़ादी की लड़ाई हो या आज़ादी के बाद का मंजर या हो देश की तरक्की का काम उसमें बढ़ चढ़ कर और कंधे से कन्धा मिला कर साथ दिया है. कहते है भारत में जब जब वीरता की बात होगी तब तब वीर शहीद अब्दुल हमीद की बात जरूर होगी। आप सोच रहे होंगे कि ये अब्दुल हमीद कौन थे। ? बॉलीवुड फिल्म ‘मेरा गाँव मेरा देश’ की कहानी में कदाचित नायक द्वारा अपने गाँव को ही अपना देश मान कर उसकी भलाई के लिए सब कुछ करते दिखाया होगा, परंतु अब्दुल हमीद के लिए केवल गाँव ही नहीं, देश भी बहुत कुछ था।

अब्दुल के अंदर बचपन से ही एक अच्छी आदत थी, हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तैयार रहना। एक बार की बात है ” गांव में एक दिन जब ज़मींदार के 50 गुंडे ग़रीब किसानों की फसल लूटने के लिए पहुँचे, तो हमीद ने उन्हें ललकारा और लुटेरों-गुंडों को खाली हाथ लौटना पड़ा। ” ऐसे ही एक बार हमीद ने बाढ़ के दौरान नदी में डूबती दो युवतियों के प्राण भी बचाए, परंतु अब्दुल हमीद की बहादुर के कारनामे धरमपुर तक सीमित कहाँ रहने वाले थे ? हमीद जब 21 वर्ष के हुए, तो रेलवे में भर्ती होने के लिए गए, परंतु उन्हें तो मानो माँ भारती पुकार रही थी। वे तो सेना में भर्ती होना चाहते थे। 1954 में उन्हें यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई और 27 दिसम्बर, 1954 को अब्दुल हमीद को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल कर लिया गया।

भारतीय सेना में शामिल होने के बाद वीर अब्दुल हमीद की पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में हुई। यहाँ वे न केवल पाकिस्तानी घुसपैठियों की अच्छे-से ख़बर लेते, अपितु उन्हें जम कर मज़ा चखाते थे। इसी पराक्रमी स्वभाव के चलते हमीद ने कुख्यात आतंकवादी डाकू इनायत अली को पकड़वाया, जिसके फलस्वरूप उन्हें प्रमोशन के साथ लांस नायक बनाया गया। उनका अरमान था कोई विशेष पराक्रम करते हुए शत्रु को मार गिराना।

भारत-चीन युद्ध 1962 के दौरान हमीद नेफा में तैनात थे, परंतु उन्हें यह पराक्रम करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। तीन साल बाद ही वह घड़ी आ गई, जब हमीद के अरमान पूरे होने वाले थे। वह घड़ी थी भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 की। हमीद की बटालियन को पंजाब में तरनतारन स्थित आसल उत्ताड़ (ASAL UTTAR) मोर्चे पर भेजा गया। मोर्चे पर जाने से पूर्व उनके भाई के कहे शब्द उनके जेहन में थे। हमीद के भाई ने कहा था, ‘पल्टन में उनकी बहुत इज्ज़त होती है, जिनके पास कोई चक्र होता है, देखना झुन्नन (हमीद) हम जंग में लड़ कर कोई न कोई चक्र ज़रूर लेकर लौटेंगे।’ भाई की भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई और अब्दुल हमीद ने आसल उत्ताड़ युद्ध में ऐसा कारनामा किया कि उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

सबसे बड़ा टैंक युद्ध

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 में आसल उत्ताड़ का युद्ध सबसे बड़ा टैंक युद्ध था। पाकिस्तानी सेना ने 8 सितंबर, 1965 को अपने पैदल सेना और अमेरिकन पैटन टैंकों के साथ आसल उत्ताड़ मोर्चे पर धावा बोल दिया। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय सीमा के 5 किलोमीटर अंदर स्थित खेमकरण पर कब्ज़ा कर लिया। यही वो जगह थी, जहाँ पाकिस्तानी सेना और वीर अब्दुल हमीद के जवानों के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप पर आरसीएल गन लेकर तैनात थे और उन्होंने उसी से टैंकों वाली सेना के छक्के छुड़ा दिए। उन्होंने उन टैंकों के साए में जाकर उससे मात्र 150 गज की दूरी पर स्थित होकर युद्ध किया था। अब्दुल हमीद का निशाना इतना अचूक था कि उस पराक्रमी जवान ने अपने पहले ही गोले में पाकिस्तानी टैंक को धूल में मिला दिया था।

उस समय के रक्षा विशेषज्ञ बताते है कि अमेरिकी टैंकों के आगे वीर अब्दुल हमीद की ‘गन मॉउंटेड जीप’ उन टैंकों के सामने खिलौना भर ही थी। लेकिन उसके बावजूद वीर अब्दुल हमीद और भारतीय सेना मुंह तोड़ जवाब दे रहे थे। वो जिस साहस के साथ पाकिस्तानी टैंकों पर गोले बरसा रहे थे, वो देखने लायक था। उन्होंने दूसरा गोला दागा और इसे बाद एक और पाकिस्तानी पैटन टैंक ध्वस्त हो गया। इस वीर जवान ने तीसरे पाकिस्तानी टैंक को भी लगभग उड़ा ही दिया था लेकिन वो वीरगति को प्राप्त हुए। हालाँकि, वो टैंक भी क्षतिग्रस्त ज़रूर हो गया था। उन्हीं टैंकों में से एक का गोला उनके पास आकर गिरा और उन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया।

इसी दौरान एक घटना और हुई जिसका जिक्र इस ब्लॉग में करना जरूरी है, कहते है उस समय भारत के इस वीर बलिदानी के जेब से एक चिट्ठी भी निकली थी, जिसमें लिखा था- “बहन! मैंने राखी के तुम्हारे वायदे को पूरा किया। मैंने दुश्मन के दो पैंटन टैंकों को तबाह कर दिया है लेकिन तीसरे को नहीं कर सका। इसके लिए माफ़ करना- तुम्हारा भाई अब्दुल हमीद।” दरअसल, इस चिट्ठी के पीछे भी एक कहानी है, जिसका जिक्र शम्भूनाथ पांडेय ने अपनी पुस्तक ‘प्रेरक कथाएँ‘ में किया है। हालाँकि, उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ कुल मिला कर 6 पाकिस्तानी टैंकों को धूल में मिला दिया था।

कहते है जब वीर अब्दुल हमीद की टुकड़ी मोर्चा संभालने के लिए जा रहे थे तो रक्षाबंधन पास में था तो जब ये सभी जवान पंजाब पहुंचे तब मोर्चा संभालने जा रहे जवानों को पंजाब बहनों ने राखी बांध कर विदा किया था इसी क्रम में जब एक महिला ने वीर अब्दुल हमीद राखी बाँधी, जैसा कि हर भाई का कर्त्तव्य होता है, अब्दुल हमीद ने भी कुछ भेंट निकाल कर अपनी उस ‘बहन’ को देनी चाही।लेकिन उस महिला ने वीर सैनिक से कुछ भी लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि आप युद्ध-क्षेत्र में दुश्मन के छक्के छुड़ा देना, मेरे लिए राखी की सच्ची भेंट यही होगी। अब्दुल हमीद को बलिदान के समय भी थी। उस वीर सैनिक के मन में देशभक्ति के अलावा राखी का ‘कर्ज’ उतारने की बात चल रही थी। जहाँ राखी बँधवाने समय उनके मन में अपार हर्ष था, बलिदान के वक़्त एक दुर्लभ संयम।

परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार है और अधिकांशत: इस अलंकरण का वही वरण कर पाता है, जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए बलिदान का वरण कर लिया हो। बहुत कम मामलों में किसी जवान को परमवीर चक्र जीते-जी मिलता है। ऐसे ही एक परमवीर चक्र विजेता का नाम है अब्दुल हमीद। वैसे अब्दुल हमीद का स्मरण करने के लिए आज कोई विशेष अवसर नहीं है, परंतु राष्ट्र की रक्षा पर बलि चढ़ने वाले वीरों की शूरवीरता के किस्से तो कभी भी कहे-सुनाए जा सकते हैं, जो आधुनिक भावी पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं।

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